संगठन में सामंजस्य या सारथी को सिखा रहे सबक…?

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मनोज चतुर्वेदी :

राजनीतिक दलों में गुटबाजी पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक सभी की नजरों में है। हम पंचायत से लेकर संसदीय क्षेत्र तक की ही बात करते है। संसदीय क्षेत्र में दो प्रमुख राजनीतिक दल जिनमें कभी लगातार वर्ष 2003 तक सत्ता में रही कांग्रेस तो दूसरा गत लगभग पंद्रह वर्षों से सत्ता में काबिज भाजपा है। दोनों ही दलों में गुटबाजियां पग-पग पर है। जब कांग्रेस प्रदेश सरकार में थी तो कभी अर्जुनसिंह गुट, कभी मोतीलाल वोहरा कभी श्यामाचन्द्र शुक्ल तो कभी अविभाजित छत्तीसगढ़ के अजीत जोगी का नाम सुर्खियों में रहा। विभाजन के बाद जब मध्यप्रदेश अलग हुआ तो अर्जुनसिंह का बोल-बाला रहा। अर्जुनसिंह के निधन के पश्चात कांग्रेस की गुटबाजी माधवराव सिंधिया व उनके पश्चात कांग्र्रेस के उत्तराधिकारी के रूप में ज्योतिरादित्य सिंधिया, कमलनाथ, दिग्विजय सिंह के बीच बटी रही। हालांकि इन सब में अभी तक दिग्विजय सिंह भारी ही रहे पर गुटबाजी ही कांग्रेस में सत्ता में रहने के बाद से सत्तासीन होने तक जारी रही। जिले में कांग्रेसी गुटबाजी स्वर्गीय सांसद दिलीपङ्क्षसह भूरिया व कांतिलाल भूरिया में रही थी तो अब कांग्रेस में यह गुटबाजी कांतिलाल भूरिया व कमलनाथ तथा ज्योतिरादित्य सिंधिया ग्रुप के बीच चल रही है। हालांकि कांतिलाल भूरिया अब भी दो अन्य गुटों से भारी है पर वक्त आने पर यह गुट भी संसदीय क्षेत्र में अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज करवाता है। यही वजह रही कि हाल ही में सम्पन्न हुए नगरीय निकाय चुनाव में सत्ताधारी दल की ओर से मुख्यमंत्री सहित तमाम प्रादेशिक मंत्रियों ने जिले में दौरा किया पर झाबुआ-रतलाम संसदीय क्षेत्र की नगरीय निकायों में कांतिलाल भूरिया व उनका डॉक्टर पुत्र विक्रांत ही मुख्य चेहरा रहा। इसका खामियाजा भी कांग्रेस को भुगतना पड़ा। भले ही कांग्रेस ने झाबुआ-आलीराजपुर जिला मुख्यालय की नगरपालिकाओं पर फलत: हांसिल की मगर नगर परीषदों में भाजपा का ही कब्जा हुआ। ऐसा भी नहीं है कि गुटबाजी सिर्फ कांग्रेस में है, भाजपा में भी गुटबाजी पग-पग पर है। चाहे संसदीय क्षेत्र का जिला आलीराजपुर हो, झाबुआ हो या रतलाम। सभी दूर गुटबाजी चरम पर है। लोकसभा उपचुनाव के समय भी गुटबाजी भाजपा में चरम पर थी तो अब भी स्थिति वही है। जिला मुख्यालय की दो नगरपालिकाओं में भाजपा की हार के बाद दोनों ही जिलों आलीराजपुर व झाबुआ में अभी तक हार के कारणों का पता लगाने न तो मंथन बैठक हुई और न ही भीतराघातियों को बाहर करने का सिलसिला शुरू हुआ। संगठन ”देर आए दुरूस्त आए तर्ज पर कुम्भकर्णी नींद से जागा”। जब संगठन के अनुसांगिक संगठनों में पद वितरण की बारी आई तो संगठन ने सारथी को सबक सिखाने कहें या संगठन में सामंजस्य स्थापित करने हेतु स्थानीय संगठन को नकार कर सामंजस्य स्थापित करने हेतु संगठन द्वारा भेजी गई पैनलों के नाम को दरकिनार कर अन्य नामों पर विचार कर संगठन का दायित्व दिया गया। इसकी बानगी भले ही संसदीय क्षेत्र के आलीराजपुर व रतलाम जिले में न देखने को मिली हो पर झाबुआ जिले में तो यही नजर आ रहा है कि प्रादेशिक संगठन, जिला संगठन में सामंजस्य या सारथी को सिखा रहे सबक…? कारण यह कि पूर्व में जनजातिय मोर्चा अध्यक्ष हेतु भी जिला संगठन की ओर से पैनल में तीन नाम गए थे पर प्रादेशिक संगठन ने विचार मंथन कहें या यूं कहें कि गोपनीय रिपोर्ट आधार पर जिले के जनजातिय मोर्चा अध्यक्ष हेतु शैलेन्द्र सौलंकी को ही कुशल नेतृत्वकर्ता माना और सौलंकी की ताजपोशी जनजातिय मोर्चा जिलाध्यक्ष पर की। कुछ इसी तरह बीते दिनों सम्पन्न हुए नगरीय निकाय चुनावों में थांदला नगर परीषद में भाजपा से बगावत करने वाले दिलीप डामोर का साथ देने वाले व्यापारी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष चन्द्रकांत पालरेचा के निष्काशन ने भी यही सिद्ध किया। उस पर मोहर बीते दिनों भाजयूमों जिलाध्यक्ष को लेकर लम्बे समय से चल रही जद्दो जहद ने आखिर विराम लगा ही दिया और यह साबित कर दिया कि कहीं न कहीं प्रदेश संगठन, जिला संगठन व उसके सारथी से नाराज हैं या यह माना जा रहा है कि अब सारथी की रवानगी तय है। क्योंकि स्थानीय निकाय चुनाव से पूर्व जिला संगठन सारथी ने सोशल मीडिया पर एक बयान जारी किया था, उस बयान में अपना सिपहसालार भी साथ में मौजूद था। प्रश्नकर्ता सोशल मीडिया संवाददाता ने संगठन सारथी से अपने सिपहसालार को भी जिलाध्यक्ष बनाए जाने संबंधि प्रश्न किया था। जिस पर बड़ी ही चालाकी से संगठन सारथी ने बयान दिया था। लग तो यही रहा था कि चलेगी संगठन व उसके सारथी की पर जब परीणाम जिला भाजयूमों अध्यक्ष के रूप में भानू भूरिया का नाम आया तो सभी आश्चर्य चकित रह गए। बताते है भानू भूरिया वर्तमान संगठन के  विरोधी नाका लाबी से माने जाते है, यही स्थिति जनजातिय मोर्चा जिलाध्यक्ष की भी है। ऐसे में कयास लगाए जा रहे है कि कहीं न कहीं राजगढ़ नाका एक बार पुन: उभरकर संगठन के सिर्स पर पहुंचने की तैयारी में है। यह तो वक्त ही तय करेगा कि राजनीति की इस चौसर पर कौन किसे सह और मात देगा, लेकिन हालिया स्थिति तो यही बयां कर रही है कि वर्तमान संगठन अब गर्त की ओर है तो कभी गर्त में गया राजगढ़ नाका एक बार पुन: अपनी खोई जमीन तैयार करने में लगा है। खैर यह राजनीतिक सह और मात की बात है पर हकीकत यह है कि स्थानीय निर्वाचन चुनाव में जिला मुख्यालय पर दो दशकों से काबिज भाजपा की हार के बाद न तो भाजपा ने यहां हार के कारणों हेतु मंथन बैठक आयोजित की और न ही कोई अब हार के कारणों का पता लगाना चाहता है। यहां तो सब यही कहते नजर आ रहे है ”जो जीता वही सिकन्दर”। सब कुछ भाजपा के पक्ष में था बावजूद उसके भाजपा को मात खाना पड़ी इस बात को लेकर भले ही प्रदेश संगठन विचार विमर्श करें पर जिला संगठन को इससे कोई लेना-देना नहीं। नहीं तो अभी तक तो आदिवासी बाहुल संसदीय क्षेत्र का वह जिला जहां कांग्रेसी क्षत्रप कांतिलाल भूरिया का वर्चस्व है और उन्ही के वार्ड क्रमांक 12 में अभी तक भाजपा विजय होकर सांसद की नाक काटती रही। वहां से लेकर नगरपालिका में नौ पार्षद सहित अध्यक्ष का जीतना भाजपा के लिए ”डूब मरने वाली” स्थिति है। मतलब स्पष्ट है भाजपाई गुटीय राजनीति स्थानीय निकाय चुनाव में इतनी चरम पर है तो आने वाले मार्केटिंग, मंडी, विधानसभा, लोकसभा चुनाव में क्या होगा। लोकसभा उपचुनाव की स्थिति पूर्व में पंचायत से लेकर पार्लियामेंट देख चुका है। पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक कमल खिलने के बाद भी मात्र एक हाथ ने कमल को इस संसदीय क्षेत्र से उखाड़ बाहर फैंका। स्थिति यही रही तो तय है आने वाले सभी चुनाव में गुटबाजी के चलते भाजपा को ”मुंह की ही खानी पड़ेगी”। यह न तो हम कह रहे है और न ही हमारी नजरों का फैर है, यह तो वह हकीकत है जो समय के साथ चल रही है।


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