क्या है जिम्मेदारी हमारी… बस इतना सा ख्वाब है…

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क्या है जिम्मेदारी हमारी के पूर्व आलेखों में ”तारे ज़मी के” के माध्यम से ख्वाब की अवधारणा बता चुकी हूँ, इस मर्तबा पुन: समय आया ख्वाबों का तो नजर एक बार पुन: तारे ज़मी से उठकर बस ख्वाब इतना सा है पर ध्यान इंगित किया तो पता चला ख्वाबों में पारम्परिक, पौराणिक, आदि संस्कृति का ही विलोप होने लगा। अच्छी बात तो यह है कि आदिवासी बाहुल जिला शिक्षित होकर शिक्षा के क्षेत्र में नए आयाम गढ़ रहा है, लेकिन हताशा तब होने लगती है जब आदि काल से चली आ रही संस्कृतियों को ही युवा पीढ़ी भौतिकता की चकाचौंध में काले चश्में लगाकर भूल जाती है। वास्तव में तो हमारी पौराणिक, पारम्परिक संस्कृतियां ही हमारी जीवन और देखें ख्वाबों की सीढ़ी है। उस सीढ़ी को ही अब हम नकारने लगे है। आज के आलेख में लेखिका निवेदिता सक्सेना इसी छोटे से ख्वाब के पीछे छुपे रहस्य को उजागर कर रही है।

दिल और दिमाग की उपज ख्वाब है, जो प्रेरक के रूप में हमें आगे बढ़ातीहै। और मंजिल की ओर पहुंचाती है। आज का आलेख वनांचल में युवावर्ग के ख्वाबों से जुड़ा है, जहां एक ओर वह पलायन कर शहरों की ओर रूख कर रहे वहीं संस्कृति का भी विलोप हो रहा है।

इस दुनिया में छोटे से छोटे बच्चे से लेकर उम्रदराज व्यक्ति तक ख्वाब संजोए हुए है। नन्ही-नन्ही आंखे हमारे वनांचल के बच्चों के इस ख्वाब को भी देखें कि खेत में निंदाई-गुड़ाई करना, सब्जियां तोडऩेजाना, तो कभी गोली बिस्कीट से लेकर मिठाई खाना परन्तु बड़े होते-होते यह परिवर्तित होने लगते है। जैसे पढ़ लिख कर अच्छा विषय (उनके नजरिये से विज्ञान व गणित) लेकर शहरों में पढना और वहीं नौकरी करना। जिसका परिणाम गांवों मे भी शहरी संस्कृति नजर आने लगी और गांव भी शहरों में  तब्दील होते दिखाई दे रहे है।

भागम भाग व मानसिक दबाव के चलते वर्तमान में एक बार पुन: मानसिकता यह होती जा रही है कि इतनी मेहनत करो, इससे तो मजदूरी में अच्छा मेहनताना मिल जाता। 2 सौ से 5 सौ प्रतिदिन की मजदूरी करना पसंद इसलिए क्योंकि खेती करने में प्रतिदिन पैसे नहीं मिलते। दूसरी बात यह भी लगती है कि खेती में मेहनत के साथ धैर्य भी जरूरी है।

बहरहाल यह भी देखने में आ रहा कि दिनों दिन शहरों की चकाचौंध  व पाश्चात्य संस्कृति का असर गांवों पर पड़ रहा है। यह क्रेजी ख्वाज उन्हे शहरों में कुछ हजार रूपये महिना की नौकरी को ज्यादा महत्व देना पसंद कर रहे। जिससे शहरीकरण तथा पाश्चात्य संस्कृति बढ़ रही है। पूर्व में वनांचल में एक संस्कृति निवास करती थी वहीं अब बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं, जिंस, टी-शर्ट, चश्मा, नित नई हेयर स्टाईल ने जगह ले ली। लगता सब मजेदार किन्तु यही तो चिन्ता का विषय भी है।

कुल मिलाकर इन ख्वाबों का फोकस सिर्फ नौकरी, जो उन्हे बढ़ते ग्राफ के रूप में दिखाई दे रही है। इन सब बातों के मद्देनजर मुझे एक किताब की कुछ लाईन ध्यान आई कि हम हिरों के खेत में खड़े थे पर पता नहीं कि जमीन  में हिरे है और ख्वाब भी हमारा हिरा पाना, और हम ख्वाबों में हिरा ढूंढने के लिए निकल पड़े खेत बेचकर।

फिलहाल देख ही रहे है कि कारण जो भी हो आर्थिक, राजनीतिक हो या सामाजिक युवावर्ग पलायन ही चाहता है। जिससे एक बहुत बड़ा नुकसान ही हो रहा है। अपनी छोटी सी जगह में राजा बनकर रहने के बजाय वह शहरों में मजदूरी करना ज्यादा पसंद करेंगे।

सही भी है जब बात ख्वाब की हो तो हर व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और वातावरणीय स्थितियों के अनुसार ख्वाब का ग्राफ उच्च स्तरीय ही होता है। यह भी एक जूनून पैदा करता है अपनी मंजिल को पाने के लिए।

जहां 90 प्रतिशत बातें पलायन से जुड़ी है, वहीं कुछ 10 प्रतिशत सकारात्मक बातें देखने में आई, जिन्होने मन खुश कर दिया। वनांचल के ही कुछ किसानों ने अपने बच्चों को अपनी जगह रहते हुए जमीन बढ़ाना, शानदार कमाई और शिक्षा भी कृषि की दिलवा रहे। जिससे हाई टेक्निक का उपयोग कर उच्च गुणवत्ता की फसल को उत्पन्न कर रहे है। जो सन्नाटा खेतों में पसर रहा और अपने वजूद से भी जूदा कर रहा।

जिम्मेदारी हमारी

वर्तमान पीढ़ी के सपनों को साकार करें उन्हे सही राह दिखाकर। जरूरी है यही माता-पिता हो या शिक्षक पहले अपने वनांचल की वास्तविकता को समझे। जैसे हमारे झाबुआ का हीरा कड़कनाथ, रतनजोत, मक्का, सोयाबीन है। साथ ही जैविक खेती जो आज की तारीख में सबसे सफलतम उत्पाद प्रदान कर रही है। वैसे भी बॉयोटेक्नॉलाजी हर क्षेत्र में आधुनिक होती जा रही है। जो हमारे हर रास्ते को आसान बना रही है। जैसे खेती के साथ-साथ पशु पालन, डेरी प्रोडक्शन, कुक्कुट पालन और ऊर्जा के नवीनीकरण संसाधन का उपयोग जैसे बायो गैस सयंत्र, सौलर हिटर आदि से ख्वाबों को उच्च आकार देकर प्रभावी रूप से साकार किया जा सकता है। जमीन चाहे छोटी ही है, तो अपनी इसी तरह ख्वाब छोटा सा पर साकार बड़े रूप में होगा।



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